
मंदिर की दानपेटी में गिरा iPhone: प्रशासन ने कहा, अब यह भगवान की संपत्ति है
तमिलनाडु के तिरुप्पोर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक श्रद्धालु का iPhone मंदिर की दानपेटी (हुंडी) में गलती से गिर गया, लेकिन जब उसने इसे वापस मांगने की कोशिश की, तो मंदिर प्रशासन ने इसे लौटाने से इनकार कर दिया।
मामला क्या है?
घटना तिरुप्पोर के एक प्रसिद्ध मंदिर की है। रिपोर्ट के अनुसार, श्रद्धालु जब मंदिर में पूजा कर रहे थे, तो गलती से उनका iPhone दानपेटी में गिर गया। जब उन्होंने इसे मंदिर प्रशासन से वापस मांगा, तो प्रशासन ने कहा कि हुंडी में डाला गया कोई भी सामान अब भगवान की संपत्ति बन जाता है।
श्रद्धालु की शिकायत
पीड़ित श्रद्धालु ने दावा किया कि यह पूरी तरह से एक गलती थी। उनका कहना है कि उन्होंने दानपेटी में iPhone डालने का इरादा नहीं किया था और उन्होंने तुरंत मंदिर प्रशासन को इस बारे में जानकारी दी। हालांकि, मंदिर प्रशासन ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया और कहा कि एक बार हुंडी में जाने के बाद, कोई भी वस्तु भगवान की संपत्ति मानी जाती है।
प्रशासन का रुख
मंदिर प्रशासन ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि हुंडी में डाली गई हर वस्तु दान मानी जाती है, चाहे वह जानबूझकर डाली गई हो या गलती से। उनका तर्क है कि यह नियम लंबे समय से चला आ रहा है और इसका उद्देश्य भगवान के प्रति भक्तों की श्रद्धा को बनाए रखना है।
सोशल मीडिया पर बहस
यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है। कई लोग मंदिर प्रशासन के इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं, तो कुछ लोग इसे धार्मिक नियमों के तहत सही ठहरा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अगर यह गलती से हुआ है, तो मंदिर प्रशासन को फोन वापस करना चाहिए। वहीं, समर्थकों का मानना है कि मंदिर के नियमों का पालन करना सभी के लिए आवश्यक है।
कानूनी दृष्टिकोण
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में दानपेटी में गलती से गिरा सामान निजी संपत्ति माना जा सकता है और इसे श्रद्धालु को वापस लौटाया जाना चाहिए। हालांकि, यह भी कहा जा रहा है कि इस तरह के मामलों में मंदिर प्रशासन के नियमों का सम्मान करना जरूरी है।
भक्तों के लिए सबक
यह मामला उन भक्तों के लिए एक सीख है, जो पूजा करते समय कीमती वस्तुएं साथ लेकर आते हैं। उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी घटनाएं न हों, जिससे विवाद उत्पन्न हो। यह घटना न केवल धार्मिक आस्थाओं और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन का मुद्दा उठाती है, बल्कि यह भी बताती है कि मंदिर जैसे स्थानों पर अपनी निजी वस्तुओं को संभालकर रखना कितना जरूरी है। ऐसे मामलों में मंदिर प्रशासन और श्रद्धालुओं को मिलकर समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए ताकि किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
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